aris Hindu Temple Pran Pratishtha: फ्रांस की राजधानी पेरिस में देश के पहले पारंपरिक हिंदू मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का महोत्सव संपन्न हो गया। इसके साथ ही मंदिर सभी दर्शनार्थियों और श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बीएपीएस अक्षरधाम संस्थान के वर्तमान गुरु परम पूज्य महंतस्वामी महाराज के करकमलों से प्राण प्रतिष्ठा विधि संपन्न हुई। समारोह में यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, अफ्रीका और एशिया समेत दुनिया के कई हिस्सों से संत, श्रद्धालु और गणमान्य अतिथि शामिल हुए।
विधिवत हुई मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा
वरिष्ठ संतों ने महापूजा के साथ प्राण प्रतिष्ठा समारोह की शुरुआत की। इसमें अक्षरपुरुषोत्तम महाराज, घनश्याम महाराज, राधा-कृष्ण, सीता-राम, लक्ष्मण-हनुमान, पार्वती-शंकर, कार्तिकेय-गणेश, पद्मावती वेंकटेश्वर, अय्यप्पा स्वामी, नीलकंठवर्णी महाराज और गुरु परंपरा की मूर्तियों की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद महंतस्वामी महाराज ने वैश्विक शांति, आपसी सद्भाव और विश्व कल्याण के लिए पहली प्रार्थना की।
एफिल टावर से गुजरी भव्य नगर यात्रा
प्राण प्रतिष्ठा से पहले पेरिस में भव्य नगर यात्रा निकाली गई। इसमें पारंपरिक वेशभूषा में कलाकारों, संगीत और भक्तिमय प्रस्तुतियों के साथ 14 सुसज्जित रथ शामिल हुए। देवी-देवताओं की श्रृंगारित मूर्तियों के साथ यात्रा एफिल टावर और एकोल मिलिटेर से होते हुए प्लास द ला कॉनकॉर्ड पहुंची। आयोजकों के अनुसार, इस यात्रा ने फ्रांस में भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के प्रेम-सौहार्द का नया अध्याय शुरू किया।
1970 में देखा गया था मंदिर का सपना
पेरिस में मंदिर निर्माण का संकल्प गुरु योगीजी महाराज ने 1970 में किया था। बाद में प्रमुखस्वामी महाराज ने अपनी विदेश यात्राओं के दौरान फ्रांस में सत्संग की नींव रखी। 2021 में भूमि पूजन और 2022 में शिलान्यास हुआ, जबकि मंदिर का निर्माण 2026 में पूरा हुआ। 13 दिवसीय महोत्सव में भारत, अमेरिका, कनाडा, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड समेत 40 से अधिक देशों से लोग पहुंचे।
5,000 वर्गमीटर में बना मंदिर
मंदिर 5,000 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला है। ऊपरी हिस्से में पारंपरिक मंदिर और नीचे सांस्कृतिक केंद्र के रूप में हवेली बनाई गई है। निर्माण में भारत, इटली, ग्रीस और वियतनाम के संगमरमर तथा ग्वालियर के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ है। परिसर में 5 शिखर, 10 गुंबद, 20 नक्काशीदार स्तंभ, 120 गवाक्ष, 49 चरित्र शिल्प प्रतिमाएं और 4 छतरियां हैं। यहां सभागृह, कक्षाएं, खेलकक्ष, प्रदर्शनी स्थल और कार्यालय भी बनाए गए हैं। यह मंदिर भारतीय संस्कृति, उपासना, प्रेम, सद्भाव और एकता का प्रतीक बनने के साथ विश्व कल्याण का संदेश देने का माध्यम बनेगा।
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